बाबा, भक्त और इक्कीसवीं सदी का भारत

बाबा, भक्त और इक्कीसवीं सदी का भारत

Society | Aug 30, 2017 / by Aishwarya Bhuta
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इक्कीसवीं सदी के भक्तों के भारत में आपका स्वागत है | यहां प्रश्न पूछनेवाले विद्यार्थी देशद्रोही कहलाते हैं पर गुनहगार बाबा के लिए देश को बर्बाद करने के नारे लगानेवाले अंधे भक्त नहीं | गोरखपुर में ७० बच्चों की मृत्यु होने पर कोई रास्ते पर नहीं उतरता, पर एक बाबा दोषी करार होने पर लाखों भक्त शहर, रेलवे स्थानक और अन्य सार्वजनिक संपत्ति को आग लगा देते हैं | सरकार मूक दर्शक बनी रहती है| तीन राज्यों में खलबली मच गई, हिंसा के कारण तीस से ज़्यादा लोग अपनी जान गँवा चुके हैं | 'भगवान का दूत' गुरमीत राम रहीम सिंह इंसान अब जेल की सलाखों के पीछे है, पर उसके समर्थकों ने जो जान-माल को हानि पहुंचाई, उसकी भरपाई कौन करेगा?

प्रोफ. सुरिंदर जोधका ने २००८ में एक विस्तृत लेख लिखा था -  लोग डेरे में क्यों जाते हैं? जोधका जी कहते हैं कि इसका कारण सिर्फ आध्यात्मिक नहीं है | लोग अपनी मन्नतें पूरी करवाना चाहते हैं | पंजाब - हरियाणा के पितृसत्तात्मक समाज में ज़्यादातर मन्नतें तो पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए ही मांगी जाती हैं | दूसरा मुख्य कारण है की डेरे में अनुयायिओं को कुछ नियमों का पालन करना होता है, मसलन शराब, नशा इत्यादि का त्याग | अपने पियक्कड़ पति से परेशान कईं महिलाएं इसी उम्मीद में डेरे में खुद जाती हैं और घर के पुरुष सदस्यों को भी ले जाती हैं | किसी गुरूद्वारे या मंदिर से विपरीत ये डेरे भक्तों को अपनापन और सुरक्षा की भावना प्रदान करते हैं | और साक्षात गुरु का आशीर्वाद हो तो क्या चिंता, क्या भय?

काफी लोगों का मानना है की इन डेरों पर सिर्फ नीची जातियों के या गरीब लोग जाते हैं | पर क्या हमने कभी सोचा है कि उन्हें वहां जाने कि ज़रूरत क्यों पड़ती है ? डेरे में किसीको जाति के आधार पर भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता | हर किसीको अपना धर्म पालने की छूट होती है | गरीबों को मुफ्त में हॉस्पिटल आदि आवश्यक सेवाएं दी जाती है | अगर सरकार इनकी आवश्यकताओं का ख़्याल करती तो शायद इन्हें डेरों में न जाना पड़ता | कहीं न कहीं यह सरकार कि इनके प्रति लापरवाही है जो इतना अप्रत्याशित रूप धारण करती है | श्रद्धा अंधश्रद्धा में परिवर्तित हो जाती है | रात के अंधेरों में, बंद दरवाजों के पीछे महिलाओं और लड़कियों का शोषण होता रहता है.. धर्म की आड़ में, महिलाओं की आत्मा की शुद्धि के झूठे झुलासे देकर उन्हें कितने ढोंगी बाबा अपनी हवस का शिकार बनाते हैं | कोई उनकी चीखों को नहीं सुनता; उनके परिवारवाले भी बाबा की अंधभक्ति में आँखों पर पट्टी बाँध लेते हैं | बलात्कार करने के लिए ज़ोर-ज़बरदस्ती से लेकर घरवालों कि हत्या कर देने की धमकी दी जाती है | राम रहीम के डेरों में गुंडाराज भी खूब चलता था |

राम रहीम जैसे बाबाओं का वर्चस्व बढ़ने की एक बहुत बड़ी वजह है मशहूर हस्तियों के बीच इनकी लोकप्रियता | प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, और विश्वप्रसिद्ध खिलाड़ी अगर बाबा का आशीर्वाद लेते हैं तो आम जनता क्यों नहीं? भारत में राष्ट्र और धर्म के बीच कभी ठोस दीवार रही ही नहीं है | भारतीय जनता पार्टी ने जैन मुनि से लेकर राम रहीम की बदौलत कईं चुनाव जीते हैं | ज़ाहिर है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ख़ास तालुकात रखनेवाली बीजेपी, जो भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाने की ओर अग्रसर है, किसी भी बाबा से नज़दीकियां बढ़ने की कोशिश करती है क्योंकि यह मत प्राप्त करने का आसान तरीका है | यह अंधश्रद्धा तथा  वोटबैंक की राजनीति है |

इस देश की एक युवा नागरिक होने के नाते मेरे मन में कईं प्रश्न उठते हैं | क्या लोग इतने अंधश्रद्धालु हो सकते हैं कि वे एक बलात्कारी, हत्यारे, ढोंगी बाबा के कुकर्मों को मानने से मुँह फेर ले? क्यों नहीं उन्होंने उसे धुतकारा और बहिष्कृत किया? क्यों वे उसके लिए देश को बर्बाद करने के लिए तैयार हो गए ? यह कैसा धर्म है कि उन्हें बम और न जाने कौनसे हथियार हाथ में लेने को कहता है? आज हम दुनिया के सामने कैसी मिसाल कायम कर रहे हैं - कि हम सिर्फ दंगे-फसाद और मारामारी करना जानते हैं? हम अपनी अंधश्रद्धा में बहकर किसीको भी हानि पंहुचा सकते हैं? हम सिर्फ गलत का साथ देते हैं? आजादी के सत्तर साल बाद भी हम सपेरों का देश हैं, और कुछ नहीं ?

जब तक अंधविश्वास देश से दूर नहीं होगा, न अच्छे दिन आएंगे, न देश बदलेगा, न आगे बढ़ेगा |

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Written By Aishwarya Bhuta

Thinker, writer and poetess who wants to change the world with her pen.

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